“कलयुग ”

                       
 कलयुग 

भूखा आदमी खुद का जमीर बेच देता है 

मरता किसान माँ समान जमीन बेच देता है !

कोई टोपी तो कोई अपनी पगड़ी बेच देता है

मिले अगर भाव अच्छा जज भी कुर्सी बेच देता है,


वैश्या फिर भी अच्छी है की वो सीमित है कोठे तक,

पुलिस वाला तो चोराहे पे वर्दी बेच देता है,
जला दी जाती हे सुसराल में अक्सर वही बेटी

के जिस बेटी की खातिर बाप किडनी बेच देता है,
कोई मासूम लड़की प्यार में कुर्बान हे जिस पर

बनाकर वीडियो उसकी वो प्रेमी बेच देता है,
ये कलयुग हे कोई भी चीज नामुमकिन नहीं

इसमे कली ,फल ,पेड़ ,पोधे ,फूल ,माली बेच देता है,
उसे इंसान क्या हैवान कहने में भी शर्म आये

जो पैसो के लिए अपनी बेटी बेच देता है…!!
मिलिन्द्र त्रिपाठी 
09098369093